क्या आप लोग जानते है कन्नौज इत्र के लिए इतना प्रसिद्ध क्यों है अगर नहीं जानते है आये जानते है इस ब्लॉग के माधयम से आप लोगो की तरफ से ऐसा दुनिया में क्या है जो आपको आपकी तरफ आकर्षित करता है मुझे ऐसा लगता है मानसून की खुसबू जो आपको आपकी तरफ अपनी आकर्षित करता है क्या आप लोगो ने कभी बारिश की खुसभू का आनंद लिया है यह खुशभु एक ऐसी है जो सिर्फ आपको बारिश में ही मिल सकती है अगर आप लोगो बारिश की खुसभू को कैद कर सके उससे अपने पास रख सके ये एक नामुनकिन सा लगता था लेकिन ये सच में आप लोग बारिश की खुसभू को महसूस कर सकते है भारत की एक कनौज एक ऐसी जगह है जहा आप पेटिकोर को बोतल में बंद करके पैक करने की कल को बताया है आप लोग जब भी कन्नौज जांयेंगे तो वहा आज भी सुगंधों के एक मादक मिश्रण आपका स्वागत करेगा जो भारत के लिए एक प्रसिद्ध इत्र की राजधानी कही जाती है
आये जानते है इसका रहस्य
कन्नौज अपने आप में पुरातात्विक और सांस्कृतिक से भरपूर है जब आप लोग कन्नोज की पुराणी गलियों में जायँगे हवा में सुगंधों की परतें आपको अपनी तरफ आकषिर्त करेंगी जिसे आमतौर पर लोग आज परफूम कहते है जब आप लोग वह दुकानदार के पास जायँगे तो आपका मन मुग्ध हो
गुलाब, चमेली, चंदन, ऊद, कस्तूरी, केसर इन सभी की खुशभु एक दूसरे से बिलकुल अलग थी आज के समाया में बताया जाता है कन्नौज भारत के उन कुछ स्थानों में से एक है जहाँ अभी भी कन्नौज इत्र का उत्पादन होता है – जिसे स्थानीय रूप से “इत्र” के रूप में जाना जाता है –
ये शहर ४०० सालो से भारत की परफ्यूम बनाने की कला को बनाये रखा हुआ है यहाँ का मौसम और उसकी उपजाऊ मिटी सुगंधित चमत्कार को बनाने के लिए जड़ी-बूटियों और फूलों की खेती के लिए सही परिस्थितियाँ देती है
गुप्त काल एवं मुगल काल -कन्नौज का उदय
सुंगंध बनाने की कला छठी शताब्दी से सुरु हो गयी थी यहाँ पर काफी राजाओ द्वारा अभिलेख लिखे गए है यह स्लिप शहर इतना महत्वपूर्ण था की राजा हर्षवर्धन ने इसका नाम बदलकर कुसुमपुरा रख दिया – फूलों का शहर। अगर हम लोग सही मायने में देखे तो मुग़ल साशन में इत्र बनाने की कला की शुरुवात हो गयी थी इस युग में फ़ारसी लोगो ने आकर ले लिया था और सम्राट अकबर के सुँगधो के प्रति प्रेम को आइन -ए-अकबरी को अछि तरह से तैयार किया गया था अकबर ने अपने शरीर में भी इत्र का इस्तेमाल किया था यही भी कहा जाता है उनकी रनिया छोटी काच की सीसियो में इस इत्र को रखा करती थी
आधुनिक बदलाव
भारत में अंग्रेजों के आगमन ने कन्नौज के इत्र उद्योग में धीरे-धीरे गिरावट की शुरुआत की। औपनिवेशिक प्रशासन के साथ पश्चिमी उत्पादों के लिए प्राथमिकता आई, और ब्रिटिश अधिकारियों और उच्च वर्ग ने पारंपरिक भारतीय इत्र की तुलना में आयातित यूरोपीय इत्र को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया। स्थानीय इत्र उद्योग, जो सदियों से फल-फूल रहा था, को नुकसान होने लगा। अंग्रेजों ने व्यापार मार्गों को भी बदल दिया और कई कच्चे माल के उत्पादन पर एकाधिकार कर लिया, जिससे कन्नौज के इत्र निर्माताओं के लिए उच्च गुणवत्ता वाले इत्र के लिए आवश्यक सामग्री तक पहुँचना मुश्किल हो गया।
इस गिरावट के अलावा, 19वीं और 20वीं सदी के दौरान, भारत के उभरते हुए मध्यम और उच्च वर्ग ने खुद को पश्चिमी स्वाद के साथ जोड़ने की कोशिश की, जिससे पारंपरिक इत्र की मांग और कम हो गई। 1990 के दशक के अंत तक, सरकार ने मैसूर चंदन की बिक्री को प्रतिबंधित कर दिया, जो इत्र उत्पादन में प्रमुख सामग्री में से एक है, जिससे इत्र की कीमतें आसमान छूने लगीं और कई लोगों के लिए ये दुर्गम हो गए। अनुकूलन के लिए, इत्र निर्माताओं ने चंदन के तेल के बजाय तरल पैराफिन जैसे विकल्पों का उपयोग करना शुरू कर दिया, लेकिन नए संस्करण मूल इत्र की प्रामाणिकता और समृद्धि से मेल नहीं खा सके।